16 Jun 2014

वात-पित्त और कफ

सबसे पहले आप हमेशा ये बात याद रखें कि शरीर मे सारी बीमारियाँ वात-पित्त और कफ के बिगड़ने से ही होती हैं ! अब आप पूछेंगे ये वात-पित्त और कफ क्या होता है ??? बहुत ज्यादा गहराई मे जाने की जरूरत नहीं आप ऐसे समझे की सिर से लेकर छाती के बीच तक जितने रोग होते हैं वो सब कफ बिगड़ने के कारण होते हैं ! छाती के बीच से लेकर पेट और कमर के अंत तक जितने रोग होते हैं वो पित्त बिगड़ने के कारण होते हैं !और कमर से लेकर घुटने और पैरों के अंत तक जितने रोग होते हैं वो सब वात बिगड़ने के कारण होते हैं ! हमारे हाथ की कलाई मे ये वात-पित्त और कफ की तीन नाड़ियाँ होती हैं ! भारत मे ऐसे ऐसे नाड़ी विशेषज्ञ रहे हैं जो आपकी नाड़ी पकड़ कर ये बता दिया करते थे कि आपने एक सप्ताह पहले क्या खाया एक दिन पहले क्या खाया -दो पहले क्या खाया !! और नाड़ी पकड़ कर ही बता देते थे कि आपको क्या रोग है ! आजकल ऐसी बहुत ही कम मिलते हैं ! शायद आपके मन मे सवाल आए ये वात -पित्त कफ दिखने मे कैसे होते हैं ??? तो फिलहाल आप इतना जान लीजिये ! कफ और पित्त लगभग एक जैसे होते हैं ! आम भाषा मे नाक से निकलने वाली बलगम को कफ कहते हैं ! कफ थोड़ा गाढ़ा और चिपचिपा होता है ! मुंह मे से निकलने वाली बलगम को पित्त कहते हैं ! ये कम चिपचिपा और द्रव्य जैसा होता है !! और शरीर से निकले वाली वायु को वात कहते हैं !! ये अदृश्य होती है ! कई बार पेट मे गैस बनने के कारण सिर दर्द होता है तो इसे आप कफ का रोग नहीं कहेंगे इसे पित्त का रोग कहेंगे !! क्यूंकि पित्त बिगड़ने से गैस हो रही है और सिर दर्द हो रहा है ! ये ज्ञान बहुत गहरा है खैर आप इतना याद रखें कि इस वात -पित्त और कफ के संतुलन के बिगड़ने से ही सभी रोग आते हैं ! और ये तीनों ही मनुष्य की आयु के साथ अलग अलग ढंग से बढ़ते हैं ! बच्चे के पैदा होने से 14 वर्ष की आयु तक कफ के रोग ज्यादा होते है ! बार बार खांसी ,सर्दी ,छींके आना आदि होगा ! 14 वर्ष से 60 साल तक पित्त के रोग सबसे ज्यादा होते हैं बार बार पेट दर्द करना ,गैस बनना ,खट्टी खट्टी डकारे आना आदि !! और उसके बाद बुढ़ापे मे वात के रोग सबसे ज्यादा होते हैं घुटने दुखना ,जोड़ो का दर्द आदि _________________________ भारत मे 3 हजार साल पहले एक ऋषि हुए है उनका नाम था वाग्बट्ट ! उन्होने ने एक किताब लिखी जिसका नाम था अष्टांग हृदयं !! वो ऋषि 135 साल तक की आयु तक जीवित रहे थे ! अष्टांग हृदयं मे वाग्बट्टजी कहते हैं की जिंदगी मे वात्त,पित्त और कफ संतुलित रखना ही सबसे अच्छी कला है और कौशल्य है सारी जिंदगी प्रयास पूर्वक आपको एक ही काम करना है की हमारा वात्त,पित्त और कफ नियमित रहे,संतुलित रहे और सुरक्षित रहे|जितना चाहिए उतना वात्त रहे,जितना चाहिए उतना पित्त रहे और जितना चाहिए उतना कफ रहे|तो जितना चाहिए उतना वात्त,पित्त और कफ रहे उसके लिए क्या करना है उसके लिए उन्होने 7000 सूत्र लिखे हैं उस किताब मे ! उसमे सबसे महत्व पूर्ण और पहला सूत्र है : भोजनान्ते विषं वारी (मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है | ) अब समझते हैं क्या कहा वाग्बट्टजी ने !! कभी भी खाना खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना !! अब आप कहेंगे हम तो हमेशा यही करते हैं ! 99% लोग ऐसे होते है जो पानी लिए बिना खाना नहीं खाते है |पानी पहले होता है खाना बाद मे होता है |बहुत सारे लोग तो खाना खाने से ज्यादा पानी पीते है दो-चार रोटी के टुकडो को खाया फिर पानी पिया,फिर खाया-फिर पानी पिया ! ऐसी अवस्था मे वाग्बट्टजी बिलकुल ऐसी बात करते हे की पानी ही नहीं पीना खाना खाने के बाद ! कारण क्या ? क्यों नहीं पीना है ?? ये जानना बहुत जरुरी है ...हम पानी क्यों ना पीये खाना खाने के बाद क्या कारण है | बात ऐसी है की हमारा जो शरीर है शरीर का पूरा केंद्र है हमारा पेट|ये पूरा शरीर चलता है पेट की ताकत से और पेट चलता है भोजन की ताकत से|जो कुछ भी हम खाते है वो ही हमारे पेट की ताकत है |हमने दाल खाई,हमने सब्जी खाई, हमने रोटी खाई, हमने दही खाया लस्सी पी कुछ भी दूध,दही छाझ लस्सी फल आदि|ये सब कुछ भोजन के रूप मे हमने ग्रहण किया ये सब कुछ हमको उर्जा देता है और पेट उस उर्जा को आगे ट्रांसफर करता है |आप कुछ भी खाते है पेट उसके लिए उर्जा का आधार बनता है |अब हम खाते है तो पेट मे सब कुछ जाता है|पेट मे एक छोटा सा स्थान होता है जिसको हम हिंदी मे कहते है अमाशय|उसी स्थान का संस्कृत नाम है जठर|उसी स्थान को अंग्रेजी मे कहते है epigastrium |ये एक थेली की तरह होता है और यह जठर हमारे शरीर मे सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि सारा खाना सबसे पहले इसी मे आता है ये |बहुत छोटा सा स्थान हैं इसमें अधिक से अधिक 350GMS खाना आ सकता है |हम कुछ भी खाते सब ये अमाशय मे आ जाता है| अब अमाशय मे क्या होता है खाना जैसे ही पहुँचता है तो यह भगवान की बनाई हुई व्यवस्था है जो शरीर मे है की तुरंत इसमें आग(अग्नि) जल जाती है |आमाशय मे अग्नि प्रदीप्त होती है उसी को कहते हे जठराग्नि|ये जठराग्नि है वो अमाशय मे प्रदीप्त होने वाली आग है |ये आग ऐसी ही होती है जेसे रसोई गेस की आग|आप की रसोई गेस की आग है ना की जेसे आपने स्विच ओन किया आग जल गयी|ऐसे ही पेट मे होता है जेसे ही आपने खाना खाया की जठराग्नि प्रदीप्त हो गयी |यह ऑटोमेटिक है,जेसे ही अपने रोटी का पहला टुकड़ा मुँह मे डाला की इधर जठराग्नि प्रदीप्त हो गई|ये अग्नि तब तक जलती हे जब तक खाना पचता है |आपने खाना खाया और अग्नि जल गयी अब अग्नि खाने को पचाती है |वो ऐसे ही पचाती है जेसे रसोई गेस|आपने रसोई गेस पर बरतन रखकर थोडा दूध डाल दिया और उसमे चावल डाल दिया तो जब तक अग्नि जलेगी तब तक खीर बनेगी|इसी तरह अपने पानी डाल दिया और चावल डाल दिए तो जब तक अग्नि जलेगी चावल पकेगा| अब अपने खाते ही गटागट पानी पी लिया और खूब ठंडा पानी पी लिया|और कई लोग तो बोतल पे बोतल पी जाते है |अब होने वाला एक ही काम है जो आग(जठराग्नि) जल रही थी वो बुझ गयी|आग अगर बुझ गयी तो खाने की पचने की जो क्रिया है वो रुक गयी|अब हमेशा याद रखें खाना पचने पर हमारे पेट मे दो ही क्रिया होती है |एक क्रिया है जिसको हम कहते हे Digation और दूसरी है fermentation|फर्मेंटेशन का मतलब है सडना और डायजेशन का मतलब हे पचना| आयुर्वेद के हिसाब से आग जलेगी तो खाना पचेगा,खाना पचेगा तो उसका रस बनेगा|जो रस बनेगा तो उसी रस से मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र और अस्थि बनेगा और सबसे अंत मे मेद बनेगा|ये तभी होगा जब खाना पचेगा| अब ध्यान से पढ़े इन् शब्दों को मांस की हमें जरुरत है हम सबको,मज्जा की जरुरत है ,रक्त की भी जरुरत है ,वीर्य की भी जरुरत है ,अस्थि भी चाहिए,मेद भी चाहिए|यह सब हमें चाहिए|जो नहीं चाहिए वो मल नहीं चाहिए और मूत्र नहीं चाहिए|मल और मूत्र बनेगा जरुर ! लेकिन वो हमें चाहिए नहीं तो शरीर हर दिन उसको छोड़ देगा|मल को भी छोड़ देगा और मूत्र को भी छोड़ देगा बाकि जो चाहिए शरीर उसको धारण कर लेगा| ये तो हुई खाना पचने की बात अब जब खाना सड़ेगा तब क्या होगा..? अगर आपने खाना खाने के तुरंत बाद पानी पी लिया तो जठराग्नि नहीं जलेगी,खाना नहीं पचेगा और वही खाना फिर सड़ेगा|और सड़ने के बाद उसमे जहर बनेंगे| खाने के सड़ने पर सबसे पहला जहर जो बनता है वो हे यूरिक एसिड(uric acid )|कई बार आप डॉक्टर के पास जाकर कहते है की मुझे घुटने मे दर्द हो रहा है ,मुझे कंधे-कमर मे दर्द हो रहा है तो डॉक्टर कहेगा आपका यूरिक एसिड बढ़ रहा है आप ये दवा खाओ,वो दवा खाओ यूरिक एसिड कम करो|यह यूरिक एसिड विष (जहर ) है और यह इतना खतरनाक विष है की अगर अपने इसको कन्ट्रोल नहीं किया तो ये आपके शरीर को उस स्थिति मे ले जा सकता है की आप एक कदम भी चल ना सके|आपको बिस्तर मे ही पड़े रहना पड़े पेशाब भी बिस्तर मे करनी पड़े और संडास भी बिस्तर मे ही करनी पड़े यूरिक एसिड इतना खतरनाक है |इस लिए यह इतना खराब विष हे नहीं बनना चाहिए | और एक दूसरा उदाहरण खाना जब सड़ता है तो यूरिक एसिड जेसा ही एक दूसरा विष बनता है जिसको हम कहते हे LDL (Low Density lipoprotive) माने खराब कोलेस्ट्रोल(cholesterol )|जब आप ब्लड प्रेशर(BP) चेक कराने डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो आपको कहता है (HIGH BP )हाय बीपी है आप पूछोगे कारण बताओ? तो वो कहेगा कोलेस्ट्रोल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है |आप ज्यादा पूछोगे की कोलेस्ट्रोल कौनसा बहुत है ? तो वो आपको कहेगा LDL बहुत है | इससे भी ज्यादा खतरनाक विष हे वो है VLDL(Very Low Density lipoprotive)|ये भी कोलेस्ट्रॉल जेसा ही विष है |अगर VLDL बहुत बढ़ गया तो आपको भगवान भी नहीं बचा सकता| खाना सड़ने पर और जो जहर बनते है उसमे एक ओर विष है जिसको अंग्रेजी मे हम कहते है triglycerides|जब भी डॉक्टर आपको कहे की आपका triglycerides बढ़ा हुआ हे तो समज लीजिए की आपके शरीर मे विष निर्माण हो रहा है | तो कोई यूरिक एसिड के नाम से कहे,कोई कोलेस्ट्रोल के नाम से कहे,कोई LDL - VLDL के नाम से कहे समज लीजिए की ये विष हे और ऐसे विष 103 है |ये सभी विष तब बनते है जब खाना सड़ता है | मतलब समझ लीजिए किसी का कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे ध्यान आना चाहिए की खाना पच नहीं रहा है ,कोई कहता हे मेराtriglycerides बहुत बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे डायग्नोसिस कर लीजिए आप ! की आपका खाना पच नहीं रहा है |कोई कहता है मेरा यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट लगना चाहिए समझने मे की खाना पच नहीं रहा है | क्योंकि खाना पचने पर इनमे से कोई भी जहर नहीं बनता|खाना पचने पर जो बनता है वो है मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र,अस्थि और खाना नहीं पचने पर बनता है यूरिक एसिड,कोलेस्ट्रोल,LDL-VLDL| और यही आपके शरीर को रोगों का घर बनाते है ! पेट मे बनने वाला यही जहर जब ज्यादा बढ़कर खून मे आते है ! तो खून दिल की नाड़ियो मे से निकल नहीं पाता और रोज थोड़ा थोड़ा कचरा जो खून मे आया है इकट्ठा होता रहता है और एक दिन नाड़ी को ब्लॉक कर देता है जिसे आप heart attack कहते हैं ! तो हमें जिंदगी मे ध्यान इस बात पर देना है की जो हम खा रहे हे वो शरीर मे ठीक से पचना चाहिए और खाना ठीक से पचना चाहिए इसके लिए पेट मे ठीक से आग(जठराग्नि) प्रदीप्त होनी ही चाहिए|क्योंकि बिना आग के खाना पचता नहीं हे और खाना पकता भी नहीं है |रसोई मे आग नहीं हे आप कुछ नहीं पका सकते और पेट मे आग नहीं हे आप कुछ नहीं पचा सकते| महत्व की बात खाने को खाना नहीं खाने को पचाना है |आपने क्या खाया कितना खाया वो महत्व नहीं हे कोई कहता हे मैंने 100 ग्राम खाया,कोई कहता है मैंने 200 ग्राम खाया,कोई कहता है मैंने 300 ग्राम खाया वो कुछ महत्व का नहीं है लेकिन आपने पचाया कितना वो महत्व है |आपने 100 ग्राम खाया और 100 ग्राम पचाया बहुत अच्छा है |और अगर आपने 200 ग्राम खाया और सिर्फ 100 ग्राम पचाया वो बहुत बेकार है |आपने 300 ग्राम खाया और उसमे से 100 ग्राम भी पचा नहीं सके वो बहुत खराब है !! खाना पच नहीं रहा तो समझ लीजिये विष निर्माण हो रहा है शरीर में ! और यही सारी बीमारियो का कारण है ! तो खाना अच्छे से पचे इसके लिए वाग्भट्ट जी ने सूत्र दिया !! भोजनान्ते विषं वारी (मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है ) इसलिए खाने के तुरंत बाद पानी कभी मत पिये ! अब आपके मन मे सवाल आएगा कितनी देर तक नहीं पीना ??? तो 1 घंटे 48 मिनट तक नहीं पीना ! अब आप कहेंगे इसका क्या calculation हैं ?? बात ऐसी है ! जब हम खाना खाते हैं तो जठराग्नि द्वारा सब एक दूसरे मे मिक्स होता है और फिर खाना पेस्ट मे बदलता हैं है ! पेस्ट मे बदलने की क्रिया होने तक 1 घंटा 48 मिनट का समय लगता है ! उसके बाद जठराग्नि कम हो जाती है ! (बुझती तो नहीं लेकिन बहुत धीमी हो जाती है ) पेस्ट बनने के बाद शरीर मे रस बनने की परिक्रिया शुरू होती है ! तब हमारे शरीर को पानी की जरूरत होती हैं तब आप जितना इच्छा हो उतना पानी पिये !! जो बहुत मेहनती लोग है (खेत मे हल चलाने वाले ,रिक्शा खीचने वाले पत्थर तोड़ने वाले !! उनको 1 घंटे के बाद ही रस बनने लगता है उनको एक घंटे बाद पानी पीना चाहिए ! खाना खाने के बाद अगर कुछ पी सकते हैं उसमे तीन चीजे आती हैं !! 1) जूस 2) छाज (लस्सी) या दहीं ! 3) दूध सुबह खाने के बाद अगर तुरंत कुछ पीना है तो हमेशा जूस पिये ! दोपहर को दहीं खाये ! या लस्सी पिये ! और दूध हमेशा रात को पिये !! इन तीनों के क्रम को कभी उल्टा पुलटा न करे !!फल सुबह ही खाएं (ज्यादा से ज्यादा दोपहर 1 बजे तक ) ! दहीं या लस्सी दोपहर को दूध रात को ही पिये ! जूस या फल सुबह ,दहीं या लस्सी दोपहर , और दूध हमेशा रात को क्यूँ पीना चाहिए ?? ज्यादा विस्तार मे न जाते हुए आप बस इतना समझे कि इन तीनों को पचाने के लिए शरीर मे अलग अलग इंजाएम उत्पन होते है ! जूस या फल सुबह को पचाने के इंजाईम हमेशा सुबह उत्पन होते है इसी तरह दहीं और छाझ को पचाने वाले दोपहर को और दूध को पचाने वाले रात को !! शाम या रात को पिया हुआ जूस अगले दिन सिर्फ मूत्र के साथ flesh out होता है ! _________________ ये तो हुआ खाने के बाद पानी पीने के बारे मे अब आप कहेंगे खाना खाने के पहले कितने मिनट तक पानी पी सकते हैं ??? तो खाना खाने के 45 मिनट पहले तक आप पानी पी सकते हैं ! अब आप पूछेंगे ये 45 मिनट का calculation ???? बात ऐसी ही जब हम पानी पीते हैं तो वो शरीर के प्रत्येक अंग तक जाता है ! और अगर बच जाये तो 45 मिनट बाद मूत्र पिंड तक पहुंचता है ! तो पानी - पीने से मूत्र पिंड तक आने का समय 45 मिनट का है ! तो आप खाना खाने से 45 मिनट पहले ही पाने पिये ! तो यहाँ एक सूत्र समाप्त हुआ ! आपने पूरी post पढ़ी बहुत बहुत धन्यवाद !! इसका जरूर पालण करे ! अधिक अधिक लोगो को बताएं post share करे !! बहुत बहुत धन्यवाद ! यहाँ जरूर जरूर click करे !! http://www.youtube.com/watch?v=Dqugl872d-s

भारतीय अस्मिता जागृत करे

ज्यादा जानकारी के लिए भाई आर्य जितेंद्र जी का ये विडियो देखिये http://www.youtube.com/watch?v=-YQTeNwuTd4&feature=youtu.be ज्यादा जानकारी के लिए भाई आर्य जितेंद्र जी का ये विडियो देखिये http://www.youtube.com/watch?v=-YQTeNwuTd4&feature=youtu.be यूं तो भारत ने दुनिया को पढ़ना लिखना और जीवन जीना सिखाया है लेकिन कुछ अज्ञानी भारतीय जो भारत मे अपवाद बनकर पैदा हुए है वो कहते है की हम तो बंदर के अवतार है और ज्ञान तो भारत मे यूरोप से आया है उन काले अंग्रेज़ो की जानकारी के लिए मैं बता दूँ की भारत ने ही दुनिया को भौतिक जगत की हर सुख सुविधाए प्रदान की है चाहे वो टेलीफोन हो या हवाई जहाज आइये जाने टेलीफोन के बारे मे ------------- टेलीफोन का आविष्कार तो भारत मे करोडों वर्ष पहले ही हो गया था लेकिन भारत वासी इतने उच्च विज्ञान और गहन अनुसंधान मे लगे थे की ऐसी मामूली वस्तु का उनके जीवन मे कोई महत्व नहीं था इसलिए ऐसी तुच्छ तकनीकी का वे उपयोग नहीं करते थे लेकिन जब भारत पर अंग्रेज़ो ने राज किया तो भारत से वे ज्ञान और तकनीकी चुराने लग गए और अपने नाम से पेटेंट कराने लग गए वास्तव मे ये आविष्कार करोडों वर्ष पहले ही भारत मे हो चुके थे । आइये आधुनिक जगत मे टेलीफोन की बात भी करे तो टेलीफोन का आविष्कार ग्राहम बैल ने किया था लेकिन वास्तव में इसका आविष्कार प्रो. जगदीश चन्द्र बसु ने किया था. ग्राहम बैल और एलीशा ग्रे नाम के दो चोरो ने तो भारत के वैज्ञानिक जगदीश जी की थ्योरी चुराई है और जब भारत के वैज्ञानिक श्री जगदीश जी ने टेलीफोन का आविष्कार किया था तो हम भारतीय ग्राहम बैल की रखेल हैलो का नाम लेकर हमारे वैज्ञानिक श्री बॉस को क्यूँ गाली दे तो! आज से मानसिक गुलामी छोड़िए और फोन आते ही जो से बोलिए जय जगदीश .......................................... किसी काले अंग्रेज़ की आत्मा को इस बात से दुख पहुचा हो तो कृपया अमेरिका और यूरोप मे चला जाये भारत को छोड़कर ये भारत सिर्फ शालिन भारतीयो का देश है

6 Oct 2011

કબીરા કુઑં એક હૈ, પનિહારી અનેક


કબીરા કુઑં એક હૈ, પનિહારી અનેક
- વિચાર વીથિકા
કબીરે એમનું બારણું ખખડાવ્યું. એ બહાર આવ્યા એટલે કબીરે એમની પાસે પીવાનું પાણી માંગ્યું. ફકીર બે પ્યાલા ભરીને પાણી લઈ આવ્યા. કબીરે પાણી પીઘું પણ પંડિતે ના પીઘું
કાશીમાં એક શેરી કબીર ચોરાતરીકે ઓળખાય છે. આજથી લગભગ સાડા પાંચસો વર્ષ પહેલાં ત્યાં નીરુ નામનો એક મુસલમાન વણકર રહેતો હતો. એક દિવસ તે એની પત્ની નીમા સાથે કાશી પાસે આવેલા લહરતારામાંથી પસાર થતો હતો ત્યારે એને ફૂલોના નાના ઢગલામાંથી એક નવું જન્મેલું બાળક મળી આવ્યું. બન્નેને એ બહુ ગમી ગયું. બાળકના માતા-પિતાની ભાળ ન મળતાં તે તેને પોતાના ઘેર લઈ આવ્યા અને તેનું નામ કબીર પાડી એનો ઉછેર કરવા લાગ્યા. વિક્રમ સંવત ૧૪૫૫ના જેઠ માસની પૂનમના રોજ સોમવારે વટસાવિત્રી વ્રત હતું એ દિવસે એમનો જન્મ થયો હોવાનું મનાય છે. મોટા થયા બાદ તે પિતાનો વણકરનો ધંધો જ કરતા હતા. બાળપણથી જ તેમનું મન પ્રભુ ભક્તિ તરફ વળી ગયું હતું. તે હંિદુ સાઘુસંતોને મળતા અને મુસ્લિમ ફકીરોને પણ મળતા અને એ સર્વે પાસેથી જ્ઞાન ગ્રહણ કરતા. આ સાઘુસંગતના આધારે એમને આત્મજ્ઞાન ઉપલબ્ધ થયું અને ઈશ્વરના એકત્વનો બોધ થયો. એ સર્વને સમજાવતા કે સર્વમાં ઈશ્વર રહેલો છે અને એની સૃષ્ટિમાં કોઈ ઊંચ-નીચ નથી. નાત-જાત-ધર્મ-સંપ્રદાયના ભેદભાવો અજ્ઞાની માણસોએ ઊભા કરેલા છે અને એ સાવ ખોટા છે.
કબીર કેટલીકવાર રૂઢિચુસ્ત પંડિતોને ધર્મનું સાચું સ્વરૂપ સમજાવતા પણ એમના ગળે એ વાત ઊતરતી નહોતી. કબીર એમને આંખના કણાની જેમ ખૂંચતા અને એમને હંમેશાં ઉતારી પાડવાનો પ્રયત્ન કરતા. પણ એની કબીર પર કોઈ અસર પડતી નહીં. એકવાર એક પંડિત ગંગામાં સ્નાન કરીને બહાર કિનારા તરફ આવી રહ્યા હતા. ત્યાં એમને કબીર મળી ગયા. ત્યાં ઘણા બધા લોકોની ઉપસ્થિતિ હતી. પંડિતને થયું કે કબીરને ઉતારી પાડવાનો આ એક સરસ અવસર છે. એટલે એ કબીર સાથે ઝગડવા લાગ્યા - તમે તો વણકર જ્ઞાતિના છો. તમને ધર્મશાસ્ત્રોમાં શી સમજણ પડે ? તેથી ધર્મ અને સંપ્રદાયની વાતો કરવાની બંધ કરી કપડાં વણવાનું કામ જ કર્યા કરો !કબીરે હસતાં હસતાં કહ્યું - મને શાસ્ત્રાર્થ કરવામાં કોઈ વાંધો નથી. તમારી ઈચ્છા હોય તો અત્યારે જ, તમે કહો ત્યાં જઈને ધર્મના સાચા સ્વરૂપની ચર્ચા કરીએ.પંડિતે કહ્યું- સારું તો અત્યારે જ બજાર વચ્ચે જઈએ અને થોડા વધારે લોકો ભેગા થાય એટલે શાસ્ત્રાર્થ કરીએ.કબીરે જોયું તો એ પંડિત એમનાથી થોડા દૂર ને દૂર રહીને જ ચાલતા હતા એટલે એ સમજી ગયા કે આ હજુ ઊંચ-નીચના વાડામાં પૂરાઈ રહેનાર જ છે.
તે બન્ને ચાલીને જઈ રહ્યા હતા ત્યાં રસ્તામાં એક મુસલમાન ફકીરનું ઘર આવ્યું. કબીરે એમનું બારણું ખખડાવ્યું. એ બહાર આવ્યા એટલે કબીરે એમની પાસે પીવાનું પાણી માંગ્યું. ફકીર બે પ્યાલા ભરીને પાણી લઈ આવ્યા. કબીરે પાણી પીઘું પણ પંડિતે ના પીઘું. એટલું જ નહીં પણ નાકનું ટેરવું ચડાવીને કહ્યું - હું વિધર્મીના ઘરનું પાણી પીતો નથી.આમ કરતાં એ આગળ વધતા ગયા. રસ્તામાં એક ચમારનું ઘર આવ્યું. કબીરે એના ઘરનું પણ પાણી પીઘું અને બ્રાહ્મણ પંડિતને પાણી પીવું છે કે કેમ એવું પૂછ્‌યું ત્યારે તેણે જવાબ આપ્યો - હું અસ્પૃશ્યના ઘરનું પાણી પીતો નથી.કબીર એ વખતે તો કશું બોલ્યા નહીં.
થોડીવાર બાદ તે બન્ને એક કૂવા પાસે આવી પહોંચ્યા. કૂવો જોઈને કબીર પંડિતને કહેવા લાગ્યા - અહીં થોડીવાર થોભી જઈએ. થોડુંઘણું જળપાન કરીને સામેના ચોતરા પર બેસીને શાસ્ત્રાર્થ કરીએ. કૂવા પર અનેક પનિહારીઓ જળ ભરતી હતી. એક મુસલમાન સ્ત્રી હતી તો એક હંિદુ. એક ચમાર હતી તો એક લુહાર જ્ઞાતિની હતી. એમાં એક બ્રાહ્મણ હતી તો એક વણિક પણ હતી. કૂવામાંથી પાણી બહાર કાઢવાના એમનાં ઘડા પણ જુદી જુદી ધાતુના અને આકાર પ્રકારના હતા. કૂવામાંથી એમણે પોતપોતાના ઘડાઓમાં જળ ભર્યું એ જોઈને કબીરે પેલા પંડિતને કહ્યું - કબીરા કુઑં એક હૈ, પનિહારી અનેક બરતન સબકે ન્યારે હૈ, પાની સબમેં એકકૂવો એક છે અને તેમાંથી પાણી કાઢનારી પનિહારીઓ અનેક છે. એમના પાત્રો વિવિધ પ્રકારનાં છે પણ એ બધામાં પાણી તો એક જ કૂવાનું સરખું જ છે. પરમ તત્ત્વ સંબંધિત ધર્મનો કૂવો એક છે. તેમાંથી જળ બહાર કાઢનાર પનિહારીઓ એટલે જુદા જુદા ધર્મ, સંપ્રદાય, વર્ણ અને જ્ઞાતિના લોકો. જળ ભરવાના પાત્રો એટલે ધર્મના સિદ્ધાંતો. એ ભલે અલગ-અલગ હોય પણ કૂવાનું જળ તો એકસમાન હોય એમ સત્ય અને ઈશ્વર તો એક જ છે.
પંડિત જ્ઞાની હતો. એને આ સમજાઈ ગયું. એનું અજ્ઞાન દૂર થઈ ગયું અને નાતજાતના તમામ ભેદભાવો દૂર થઈ ગયા અને તે બધાના હાથનું ખાવા-પીવા લાગ્યો!